Friday, 10 May 2013

Welcome


Welcome to Maharshi Mehi Ashram Kuppaghat Bhagalpur (May 2013)      ----------satguru bhawsagar dar bhari .---kaam krodh mad lobh bhanwar bich larjat naav hamaari----trishna lahar uthat din raati laagat ati jhak jhora--mamata pawan adhik darpaave ,kanpat hai man mora----aur maha dar naanaa bidhi ke chhinchhin mai dukh paaun.---antaryaami binti suniye yah mai araj sunaau.---GURU Sukdev sahay karo ab dhiraj raha n koi --Charan das ko paar utaaro saran tumhari khoi -----(sant chran das)

35 comments:

  1. আমি আমি করি বুঝিতে ন পারি কে আমি আমাতে আছে কি রতন ।
    কুন শক্তি বলে বেড়াই চলে বলে কার অভাভে হাভে দেহ অচেতন ।।
    দেহে মাঝে আছি প্রানের সঞ্চার,তাহা তেই বালি আমি ভা আমার
    প্রাণ গেল চলে হাভে সাভাকার ,কেভা কার কথা রাভে ধনজন ।।
    প্রানেরই চাঞ্চল্যে জিভ ভাভ ঘটে চঞ্চলতা গেলেই সকল আসা মিটে ।
    স্থিতি হলে সাদা দেখি চিত্তাপাতে আঁকা আছে বাঁকা মদান মহান ।।
    অপরূপ তাঁর রূপের মাধুরী ,দৃষ্ট মাত্র করে মান প্রাণ চুরি "
    কেমন মহিমা বুঝিতে না পারি ,সকল পাসরি হেরি নাভ্ঘান ""।।
    [যোগী পান্চানান্দ বাত্তাচার্য ]

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  2. धर गर मस्तक सीध साधि आसान आसीना
    बैठिके चखु मुख मुन्दि इष्ट मानस जप ध्याना
    प्रेम नेम सों करत करत मन शुद्ध हो
    अरे ,हाँ रे मेही अब आगे को कहूँ सुनो दे चित्त सो
    जंह जंह मन भगि जाय ताहि तंह तंह ते तत्क्षण
    फेरि फेरि ले जाई लगाइये ध्येय में आपण
    ऐसे हि करि प्रतिहार धारणा धारण करिके
    अरे हाँ रे मेही औरो आगे बढिए चढिये ,धर धारा धरि के ॥
    [सत्संग योग --महर्षि मेही ]

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  3. अर्जुन बोले:-
    "जो स्थितप्रज्ञ पुरुष है
    उसके होते क्या लक्षण ?
    बोलता किस तरह है वह ?
    बैठता किस तरह है वह ?
    कैसे करता है विचरण ?"
    भगवन बोले :-
    "मन के सरे कम त्यागकर परम तोष मे जीता
    स्थितप्रज्ञ वही अर्जुन जो आत्म-तुष्टि होता है।
    राग-द्वेष-भय-सभी क्षणों में रहता है समभावी
    है वह स्थितप्रज्ञ नहीं जो हँसता या रोता है !
    क्या शुभ और अशुभ क्या उसको अपना याकि पराया
    कभी नहीं छू सकती उसको जगत भाव की छाया
    सभी अंग सम्यक समेत कर कछुआ रहता जैसे
    विषय मुक्त होकर जीता है स्थित्प्रज्ञ भी वैसे [
    [ श्री मद्भगवद्गिता अध्याय --२--श्लोक--५५--तथा --५६ ]
    translation---arjuna said ,--Krishna what is the mark of the God realized soul,stable of mind and established in Samadhi [perfect tranquillity of mind]?How does the man of stable mind speak,how he sits,how walks?
    shi bhagwan said Arjun,when one thoroughly abandons all cravingsof the mind,and is satisfied in the self through[the joy, of] the self,then he is called stable of mind .
    The sage ,whose mind remains unperturbed in sorrows ,whose thirst for pleare has altogather disappeared ,and who is free from passion,fear,and anger ,is called stable of mind. [Gita Adhyay -2 --slok--55&56]

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  4. "जो द्वेष-भाव से परम मुक्त,
    जो सर्व-मीत्र जो दया-युक्त
    कर्तापन से जो मुक्त-भार,
    जिसमे न तनिक भी अहंकार
    सुख दुख में जीता एक भाव
    जग का न कहीं कोई प्रभाव,
    जो है सहिष्णु ,संतुष्टपरम
    अपने पर नित जिसका संयम
    बुद्धि से सुथिर ,मन से निश्चल
    भक्ति में निरत अविराम ,अचल
    मुझको भाता है ऐसा जन
    वह मुझको पाता है अर्जुन !
    श्रीमद्भाग्व्द्गित। काव्यानुवाद अध्याय --१२[अनुवादक -इंदुशेखर ]
    ॐ प्रणवो धनुह ,शरोहि आत्मा ,ब्रह्म तल्लक्ष्य उच्यते --अप्रमत्तेन बेधव्यां ,सर्व तन्मयो भवेत् -
    --अर्थ --प्रणव बिंदु धनुष है ,आत्मा वाण है ,उस वाण का लक्ष्य ब्रह्म है जितेन्द्रिय पुरुष को उसे सावधानी से बेधना चाहिए ।तन्मय होकर वाण बेधना चाहिए ।
    [नोट -यह ध्यान करने की गहराई को संकेत करता है ]

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  5. सुखमन के घर राग सुनि, सुन मंडल लिव लाय ।
    अकथ कथा बिचारिये, मनसा मनहि समाई॥
    sukhaman ke rag soni, sun mandal liv lay|
    akath katha bicharye,mansa manhi sami||
    (Guru Nanak Dav)
    Meaning:- Guru Nanak says that the spiritual practitioner hears the inner divine sound at the dimenstion less postion (Voied or Spinal cordor Sukhamana) and his mind is absorbed in the inner vacum spher and realizes the knowledge benod speach and the auter mind merges into the inner mind by practicing Yoga of inner divine sound (Nadanusandhan)
    * Acharye Mehershi Harinandan premhans ji Maharag is coming on 25-09-13
    Mahershi Mehi Ashram, Kuppaghat, Bhagalpur, Bihar

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  6. सुरत शब्द एक अंग कर, देखो बिमल बहार।
    मध्य सुखमना तिल बसे, तिल में जोत अपार॥
    Surat shabd ek ang kar, dekho bimal bahar|
    Madhya sukhamana till basai, till me jot apar||
    Meaning:- The inner divine sound and consciousness merged in sacred scenes. In the middle of the Spinal Code [sukhamana] exists and there is vast divine light in the divine point [till] The consciousness sound be brought to inner divine point in the right side it there is stream of the inner divine sound.

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  7. "जिसको कोई उद्वेग नहीं छूता किंचित
    जो शोक -मुक्त ,कामना -मुक्त
    सारे ही कर्मो से विमुक्त
    जो मननशील,स्तुति विरक्त
    जो अनिकेत ,जो अनासक्त
    मुझको भाता है ऐसा जन ,
    वह मुझको पाता है अर्जुन !
    जो कहा वही तो धर्म -अमिय
    निष्काम भाव से पीता जो
    मेरे निमित्त ही जीता जो
    है वह जन मुझको अतिशय प्रिय ।"
    [श्री मद्भग्वद गीता अध्याय --१२]

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  8. "जिसको कोई उद्वेग नहीं छूता किंचित
    जो शोक -मुक्त ,कामना -मुक्त
    सारे ही कर्मो से विमुक्त
    जो मननशील,स्तुति विरक्त
    जो अनिकेत ,जो अनासक्त
    मुझको भाता है ऐसा जन ,
    वह मुझको पाता है अर्जुन !
    जो कहा वही तो धर्म -अमिय
    निष्काम भाव से पीता जो
    मेरे निमित्त ही जीता जो
    है वह जन मुझको अतिशय प्रिय ।"
    [श्री मद्भग्वद गीता अध्याय --१२]

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  10. तीन अवस्था तजहु, भजहु भगवंत मन क्रम बचन अगोचर व्यापक व्याप्य अनंत [--, गो० स्वामी तुलसी दास जी महाराज --विनय पत्रिका ]
    To devote Supreme Sovereigh, One has to give up three natural states (i. e. wakefullness, Dream and Sleep). The Supreme is beyond the reach of mind action, speach and supra-sensory. He pervades all over the creation .He is also pervating (the creation) and infinite, [Goswami Tulsidas ji Maharaj---Binay patrika]

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  11. तीन अवस्था तजहु, भजहु भगवंत मन क्रम बचन अगोचर व्यापक व्याप्य अनंत [--, गो० स्वामी तुलसी दास जी महाराज --विनय पत्रिका ]
    To devote Supreme Sovereigh, One has to give up three natural states (i. e. wakefullness, Dream and Sleep). The Supreme is beyond the reach of mind action, speach and supra-sensory. He pervades all over the creation .He is also pervating (the creation) and infinite, [Goswami Tulsidas ji Maharaj---Binay patrika]

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  12. नैनहु आगे देखिये आतम अंतर सोई
    तेज पुंज सब भरि रह्या ,झिलमिल झिलमिल होई
    Meaning --Sant Dadudayal says--
    "Notice firmly in front of your eyes within yourself.Dazzling brilliant light is found there everwhere.

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  13. निराधार निज देखिये , नैनहु लगा बंद
    तंह मन खेले पीव सो दादू सदा आनंद
    Sant Dadu says,
    "Behold within atease (without suport) yourself in natural position after closing your eyes. There, mind always plays with God pleasently."

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  14. महात्मा मोहनदास करमचंद गाँधीजी के विचार
    अवतार से तात्पर्य है शरीरधारी पुरुष-विशेष । जीवमात्र ईश्वर के अवतार है; परन्तु लैाकिक भाषा में सबको हम अवतार नहीं कहते। जो पुरुष अपने युग में सबसे श्रेष्ठ धर्मवान होता है, उसी को भावी प्रजा अवतार-रूप से पुजती है। इनमें मुझे कोई दोष नहीं जाना पड़ता; इसमें न तो ईश्वर के बडप्पन में ही कमी आती है, न सत्य को ही आघात पहुँचता है। "आदम खुद नहीं, लेकिन खूदा के नूर से आदम जुदा नहीं ।" जिसमें धर्म-जागृती अपने युग में सबसे अधिक है, वह विशेशावातर है। इस विचार-श्रेणी से कृष्णरूपी सम्पुर्णवातार आज हिन्दू-धर्म में साम्राज्य-उपभोग कर रहा है। [अनासक्ति योग, ( श्री मद्भग्वद गीता का अनुवाद ), प्रस्तावना, पृ० ८-९ ]

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  15. भक्ति दुवारा साकरा, राई दसवें भाव ।
    मन एरावत ह्रै रहा, कैसे होय समाव ॥
    Sant Kabir Says:-
    The gate way of Devotion is very-very small.(infinite saimal). It is less than the 10th part of mustard seed. The Traveller is one's mind. It is beving larger and lavger greater than the greatest elephant "Airawat" (It is as big as his world). How it can go within devotion? In this position he can not be a true devotee. If one wants to be a devotee his will should be too short.

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  16. भक्ति निसेनी मुक्ति की, संत चढे सब धाय।
    जिन-जिन मन आलस किया, जनम जनम पछिताय॥
    Sant Kabir Says:-
    That True. Devotion is the ladder of sulvation. All sants went through this ladder. But an ideal person did not do so. Hence he had to repant for many lives uptil he regets human body.

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  19. प्रभु तोहि कैसे देखन पाँउ|
    तन इंद्रिन संग माया देखु, मायातीत धरहु तुम नाउ ।
    मेधा मन इंद्रिन गहे माया ,इनमे रहि माया लिपटाऊं ।
    इंद्रिन मन अरु बुद्धि परे प्रभु ,मैं न इन्हे तजि आगे धाउ ।
    करहु कृपा इन्ह संग छोरावहु ,जड़ प्रकृति कर पारहि जाऊं ।
    मेही अस करुणा कर स्वामी ,देहु दरस सुख पाई अघाउँ ॥[महर्षि मेही ]

    O God! how can I see you ?
    I am seeing illusion within body and senses but you are called illussionless. Intellect, mind and senses deals in illusion. But I could not go beyound these.
    Please have your mrecy such that I could leave these companion and could go beyound the non-concious nature.
    Sant Mehi prays, " O God be pityful to have your real feeling (by going beyound non-cocious nature, leaving intellect, mind and senses, being ownself only). Thus I wold be devinely plcased with full satisfaction. [Maharshi Mehi ]

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  20. जो तेहि पंथ चले मन लाइ ।तो हरि काहे न होहि सहाई ||[Goswami Tulsidas]
    Meaning---
    If one devotee is on his path with full confidence ,he works sincerely God must helps him. [vinay patrika ]

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  21. सतगुर संत कंज में बासा । सूरत लाइ जो चढ़े आकासा ॥
    स्याम कंग लीला गिरि सोई । तिल परिमान जान जन कोई ॥
    छिन छिन मन को तहाँ लगाबै । एक पलक छूटन नहि पावै ॥
    श्रुति ठहरानी रहे अकासा । तिल खिरकी में निसदिन वासा ॥
    गगन द्वार दीसै एक तारा । अनहद नाद सुनै झनकारा ॥
    अनहद सुनै गुणै नहि भाई । सूरति ठीक ठहर जब जाई ॥
    {तुलसी साहब ----घट रामायण जीब का निबेरा}
    भावार्थ------
    ख्याल के सहारे शून्य (आकाश) में स्थित शिब नैत्र में जब कोई चेतन धारो के साथ पहुचता है तो उसे संत सद्गुरु के दर्सन होते है. अपने अंतर के काले कमल (अंधकार) में तिलके डेन के सामान छोटे इस गुप्त स्थान को कई कई बिरला ही जनता है. यह समस्त लीलाओ का खजाना ही है. यहाँ पर मन को हमेसा इस प्रकार लगावे कि एक क्षण भी छूटने ना पावे। इस अभ्यास से सुरत धीरे-धीरे शून्य में ठहर जाता है. वह हमेसा तिल जैसी छोटी खरकी (शिवनेत्र) में ठहरने लगता है. वहाँ शून्य मार्ग के दरवाजे पर उसे एक अलौकिक तारा दीख पड़ता है. वह बहुत से शब्दो (अनहद नाद) की सुरीली आवाज सुनता है. ख्याल (सूरत) जब अच्छी तरह ठहर जाता है तो मन का गुनावन छूट जाता है। मन उस शब्द के वश में होकर उसमे लीन हो जाता है

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  22. सतगुर संत कंज में बासा । सूरत लाइ जो चढ़े आकासा ॥
    स्याम कंग लीला गिरि सोई । तिल परिमान जान जन कोई ॥
    छिन छिन मन को तहाँ लगाबै । एक पलक छूटन नहि पावै ॥
    श्रुति ठहरानी रहे अकासा । तिल खिरकी में निसदिन वासा ॥
    गगन द्वार दीसै एक तारा । अनहद नाद सुनै झनकारा ॥
    अनहद सुनै गुणै नहि भाई । सूरति ठीक ठहर जब जाई ॥
    {तुलसी साहब ----घट रामायण जीब का निबेरा}
    भावार्थ------
    ख्याल के सहारे शून्य (आकाश) में स्थित शिब नैत्र में जब कोई चेतन धारो के साथ पहुचता है तो उसे संत सद्गुरु के दर्सन होते है. अपने अंतर के काले कमल (अंधकार) में तिलके डेन के सामान छोटे इस गुप्त स्थान को कई कई बिरला ही जनता है. यह समस्त लीलाओ का खजाना ही है. यहाँ पर मन को हमेसा इस प्रकार लगावे कि एक क्षण भी छूटने ना पावे। इस अभ्यास से सुरत धीरे-धीरे शून्य में ठहर जाता है. वह हमेसा तिल जैसी छोटी खरकी (शिवनेत्र) में ठहरने लगता है. वहाँ शून्य मार्ग के दरवाजे पर उसे एक अलौकिक तारा दीख पड़ता है. वह बहुत से शब्दो (अनहद नाद) की सुरीली आवाज सुनता है. ख्याल (सूरत) जब अच्छी तरह ठहर जाता है तो मन का गुनावन छूट जाता है। मन उस शब्द के वश में होकर उसमे लीन हो जाता है

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  23. शब्दु तत्व वीर्य संसार । शब्द निरालमु अपर अपार ॥
    शब्द विचारि तरे बहु भेष । नानक भेदु न शब्द अलेषा ॥
    सारी सृष्टि के पाछै । नानक शब्द घटै घटि आछे ॥
    [बाबा नानक साहेव ]
    एक शब्द सब कुछ किया, ऐसा समरथ सोय ।
    आगे पीछै तौ करै, जे बलहीना होय ॥
    शब्दै बंध्या सब रहै, शब्दै सब ही जाय ।
    शब्दै ही सब उपजै, शब्दै सबै समाई ॥
    [संत दादू दयाल ]
    Guru Nanakdev says “that inner divine sound is the cause of the world. It is beyond limit and base. It is inner divine sound that leads to soundless state. It is unsaid and limitless. The whole universe has come out of inner divine sound and it merges in inner divine sould.”
    Sant Dadu Dayal says- “Only inner divine sound [sabd] did all; It is very powerful. If any thinks otherwise he is wrong. The inner divine sound [sabd] is the cause of the universe. The universe merges in the inner divine sound [sabd].”

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  24. शब्दु तत्व वीर्य संसार । शब्द निरालमु अपर अपार ॥
    शब्द विचारि तरे बहु भेष । नानक भेदु न शब्द अलेषा ॥
    सारी सृष्टि के पाछै । नानक शब्द घटै घटि आछे ॥
    [बाबा नानक साहेव ]
    एक शब्द सब कुछ किया, ऐसा समरथ सोय ।
    आगे पीछै तौ करै, जे बलहीना होय ॥
    शब्दै बंध्या सब रहै, शब्दै सब ही जाय ।
    शब्दै ही सब उपजै, शब्दै सबै समाई ॥
    [संत दादू दयाल ]
    Guru Nanakdev says “that inner divine sound is the cause of the world. It is beyond limit and base. It is inner divine sound that leads to soundless state. It is unsaid and limitless. The whole universe has come out of inner divine sound and it merges in inner divine sould.”
    Sant Dadu Dayal says- “Only inner divine sound [sabd] did all; It is very powerful. If any thinks otherwise he is wrong. The inner divine sound [sabd] is the cause of the universe. The universe merges in the inner divine sound [sabd].”

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  25. जीवन से मरना भला जो मरि जाने कोय ।
    मरने पहले जो मरे अजर अरु अम्मर होय ॥
    (संत कबीर)
    Sant Kabir says that- It is better to die than to live alive If one knows how to die ? It is a technique of meditation such that one can die before actual death (i.e.- the end of life in this material world).In deep meditation one goes up the third eye (eastern star, sukhmana). His all the limbs of the body evean the pulpitation of heart becomes calm and qiite peasufal, It is the state of Samadhi. This is the state of a dead body But again he comes back into sensation and becomes alive. That Person can find alminghty and becomes immortal and fireproof
    [Sant Kabir]

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  26. मरिये तो मरि जाइये,छूटि पड़े जंजार ।
    ऐसी मरनी को मरे, दिन में सौ सौ बार ॥
    [संत कबीर]
    Sant kabir says that- If you want to die, you die perfectly such that you may be out of all illusion( of this creation and be out of rebirth circle). Sant kabir asks who is the person that dies hundred thimes in a day in such a way during meditation( He is dead or alive according to his will)
    [Sant Kabir]

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  27. गागर उपर गागरी चोले ऊपर द्वार ।
    सूली ऊपर सांथरा जहाँ बुलावे यार ॥
    [संत कबीर]
    There are pitchers over pitcher and there is a door above the body which we have wear. The bed is on the tip of the pointed nail where we are called by our closest friend (which is all mighty God)
    Explanation:- Subtle, causal ,supra causal and conscious these four kinds of bodies are within human material body. Bodies are like the pitcher. The first pitcher is this material body has been worn by us. There is a very thin way like a door in this body to get into the next suletle body. This very thin[ pointed] place is the toppest place of this body. A devotee can caoss it by the method of meditation. At the end he finds the primal sound of zero wave-lenth .When one stay on it he finds the vibrationless state of supreme sovereigen God who is our nearest friend
    [Sant Kabir]

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  28. SWAMI SHRIDHAR BABA--------- wami Shridhar Baba was the seniormost attendant and disciple of Sadguru Mehi. He was initiated in Santmat in the year of 1928 by Sadguru Mehi with 4 methods of meditation (Manas Jap, Manas Dhyan, Drishti Yoga and Naadaanusandhaan). Since then he liked the holy company of Guru Maharaj (Sadguru Mehi) and used to serve him in all possible ways. To do the innermost meditation of Naadaanusandhaan (i.e. Surat-Shabda Yoga i.e. the Yoga of Divine Sound), Sadguru Mehi was in search of secluded and peaceful place where no outer disturbance could reach. At that time Guru Maharaj, along with Swami Shridhar baba and Chhataru Das, came to the holy ancient cave of Kuppaghat in Bhagalpur (Bihar State, India). This place was on the bank of river Ganga and it attracted Guru Maharaj. The cave was cleaned by Swami Shridhar Baba and other Satsangis and then this cave was ready for meditation. Sadguru Mehi used to enter in the cave at 9 am for the meditaiton and used to come out at 12 pm. During this time Shridhar baba used to prepare meal of the day. After taking lunch and rest, again Guru Maharaj used to enter in the cave at 4 pm and used to come out at 7 pm or 8 pm. Swami Shridhar baba used to do all other works like cleaning, gardening, clothes-washing alongwith cooking. Chhataru Das also used to help in this service of Sadguru Mehi. Sadguru Mehi had instructed Swami Shridhar Das during His practice of Naadaanusandhaan, "You also practise the yoga of Divine Sound (i.e. Naadaanusandhaan) and write down the sounds that you hear within." ...
    To bring the life of Swami Shridhar - a real devotee and seniormost attendant of Sadguru Mehi - in the public view, an attempt was made to write his biography. Amighunt (Drop of Amrit i.e. ambrosia or nectar) is a holy book that brings the life of Swami Shridhar visible to us but concise. In this book, Amighunt, the author has sketched the life of Swami Shridhar on the facts heard by Swami Shridhar and also he added the precious teachings / preaches of Swami Shridhar delivered in various Satsangs. The name of author of Amighunt is Swami Sachchidanad, an attendant of Swami Shridhar and devotee of Sadguru Mehi. Reading this book, we, the common people, can learn the staunch dedication towards Guru, selfless service to Master, living with real and honest work and hard practice of meditation. We can get inspiration to become as Swami Shridhar in our lives. How a pupil should live and obey his Master sacrificing ego and praise -- we can learn knowing the life of Swami Shridhar.


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  29. कोई बिरला यही बिधि नाम कहे
    मंत्र अमोल नाम दुइ अच्छर ,बिन रसना रट लागि रहे ।
    होठ न डोले जीभ न बोले सुरति धरणी दृढाई गहे ।
    दिन और राति रहे सुधि लागि ,यही माला यही सुमिरन है|
    जन दूलन सत्गुरुं बतायो ताकि नाव पार निबहे ||[sant Dulan Das ]
    Sant Dulan Das says :-
    Rare person is who pronounces (recites) the pious name like this .The pious name is of two letters. It is pronounced constantly but without tongue lips do not move and tongue does not speak. But his consciousness is firmly bound by the space of nodimention (i.e.-void, or Sukhmana). His consciousness is remembering continuously along whole day and night. This position of his mind is a real garland of used for recitement of pious name saint Dulan Das says it is taught by a real preceptor. One who has done like this his boat has crossed the ocean of illusion of creation. He realises the ultimate Reality

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  30. सखी री क्यों देर लगाई, चटक चढ़ो नभ द्वार।।
    इस नगरी में तिमिर समाना, भूल भरम हर बार ।
    खोज करो अंतर उजियारी, छोड़ चलो नौ द्वार।।
    साहस कँवल चढ़ त्रिकुटी धाओ, भँवरगुफा सतलोक निहार।
    अलख अगम के पर सिधारो, राधास्वामी चरण सम्हार।।
    Sant Radhawami Says “O, friend! why so late, be bravo and climb on the door in sky (i.e. void, third eye, Sukhmana etc-). The town in which you live is the material world below third eye. It is full of darkness. Hence you are in confusion and commit mistakes oftenly. Therefore search inner light and leave this material world by leaving this human body of nine doors (Eyes-2, Nose-2 Ears-2, Mouth-2, Anus-1, Penis-1) stayiving in the healthy guidance of real frecptor Radhswami says, go above on the inner path and cross Sahasdalkamal, Trikuti, Bhawargupha, Satlok, Alakh, Agam, and finaly realies the Suprem Sovereign. [sant Radhaswami ]

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  31. सखी री क्यों देर लगाई, चटक चढ़ो नभ द्वार।।
    इस नगरी में तिमिर समाना, भूल भरम हर बार ।
    खोज करो अंतर उजियारी, छोड़ चलो नौ द्वार।।
    साहस कँवल चढ़ त्रिकुटी धाओ, भँवरगुफा सतलोक निहार।
    अलख अगम के पर सिधारो, राधास्वामी चरण सम्हार।।
    Sant Radhawami Says “O, friend! why so late, be bravo and climb on the door in sky (i.e. void, third eye, Sukhmana etc-). The town in which you live is the material world below third eye. It is full of darkness. Hence you are in confusion and commit mistakes oftenly. Therefore search inner light and leave this material world by leaving this human body of nine doors (Eyes-2, Nose-2 Ears-2, Mouth-2, Anus-1, Penis-1) stayiving in the healthy guidance of real frecptor Radhswami says, go above on the inner path and cross Sahasdalkamal, Trikuti, Bhawargupha, Satlok, Alakh, Agam, and finaly realies the Suprem Sovereign. [sant Radhaswami ]

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  32. रैन दिन संत यों सोवता देखता ,संसार की ओर सॆ पीठि दिये ।
    मन और पवन फिर फूटि चाले नहीं चंद औ सूर को सम्म कीये ।
    टकटकी चंद चक्कोर ज्यों रहतु है सूरत औ निरत का तार बाजे ।
    नौबत घुरत है रैन दिन शून्य में कहे कबीर पीउ ग़गन गाजे ॥ [संत कबीर ]
    Sant kabir says ---Asaint behold within all day long opposite to this material world in sleeping mode .[It is done by the technic of yoga or meditation].In this state he equalises sun and moon [sun is the flow of right consciousness and moon is the flow of left consciousness].Hence his mind and breath do not work differently.He looks constantly and continuously to his goal same as the partridge [a kind of bird ]looks fullmoon for the whole night.It results his consciousness merge into his goal [i.e. void ]and he finds its melodious sound.This sound is always heard continuously in the sky [void].Sant Kabir says in the void this is the song of Supreme Sovereign.

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  33. नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
    स्वल्पमप्यस्य धमर्स्य त्रायते महतो भयात ॥
    ( गीता-२ /४०)
    Lord Krishna preaches to Arjuna that the devotion to the inner path of Yoga (1) never gives contrary result (2) even a little begining of this path can not be destroyed and it saves from the greatest fear. The greatest fer is to be other then human i.e is to not gat human body in the world.
    भगवान कृष्णा अर्जुन को बताते है कि(१) इस योग का उल्टा फल नहीं होता यानि यह ईस्वर को प्राप्त करा ही देता है (2) योग के आरम्भ का नाश नहीं होता (३) और महा भय से बचता है यानि मानुष के अतिरिक्त किसी अन्य योनि में नहीं जाता है

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  34. रैन का भूषण इंदु है दिवस का भूषण भान ।
    दास को भूषण भक्ति है भक्ति को भूषण ज्ञान ||
    ज्ञान को भूषण ध्यान है ध्यान को भूषण त्याग |
    त्याग को भूषण शांति पद तुलसी अमल अदाग||
    [वैराग्य संदीपनी --गो० तुलसीदास ]
    Meaning—The beauty of night is the Moon similarly that of day is the Sun.Like wise the beauty of devotee is devotion.But the shining [beauty] of devotion is real knowledge.and it is more beautifulwhen it is with meditation .Meditation is true when all the wanting has gone .there is no will of worldly substances.. it is perfect bright when there is perfect peace.There is absolute rest. ,steadiness or stillness state ,or soundless state.It is absolutely pure and fine [Saint Tulsidas]




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  35. सुरतिया हो नैना से न टरे ॥
    यह सुरतिया मेरो मन हरि लीन्हा ,नाहि जरे न मरे ॥
    जब देखत तब सन्मुख दरसे कोटिन रूप धरे ॥
    शिव नारायण कही समुझावल बिरलहि सूझी परे ॥
    [संत शिव नारायण ]
    If one stay within with his siight ,he beholds so many beautiful sight.Saint shivnarayan says ,'".But it is seen by rare person ".

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